Monday, 17 August 2020

आचार्य देवो भवः

 

आचार्य देवो भवः

 

शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। वह समाज का निर्माता है। सभ्यता, संस्कृति का अग्रदूत है। शिक्षक से रहित सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती है। वह समाज विकसित नहीं हो सकता जो शिक्षित न हो। शिक्षित समाज में शिक्षक एक मुख्य अंग है। शिक्षक रहित शिक्षा की कल्पना व्यर्थ है। शिक्षक ही सही शिक्षा देने के योग्य होता है। समाज के मुख्य अंग के रुप में प्राचीन काल से ही शिक्षक को उचित सम्मान प्राप्त है। वर्तमान में भी शिक्षक को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। सभ्य नागरिक शिक्षक के महत्व को जानता है अतः वह उसे सम्मान करता है। साथ ही शिक्षक को भी अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करनी चाहिए। वह शिक्षक धर्म निभाकर शिक्षक समाज के आत्मगौरव को बढ़ाता है। अपवाद हर जगह होते है, अतः शिक्षक समाज भी अपवादों से अछूता नहीं है। फिर भी शिक्षक को अपने सम्मान की रक्षा स्वयं करनी चाहिए।

किस युग में समाज विकसित था यह उस युग के साहित्य से ज्ञात होता है। स्वाभाविक है कि साहित्य लेखन शिक्षित समाज से आएगा, अतः विकसित समाज के लिए शिक्षा और शिक्षक महत्वपूर्ण है। समाज को शिक्षक का सम्मान देना होगा।

 

तैतिरोपनिषद के शिक्षावल्ली के ग्यारहवेँ अनुवाक में गुरु शिष्य को सामाजिक आचरण के पालन की शिक्षा देते है- सत्यं वद। धर्मं चर। मातृ देवो भवः। पितृ देवो भवः। आचार्य देवो भवः। अतिथि देवो भवः। स्वाध्यांयान्म प्रमदः।  

 

यहाँ पर आचार्य शिष्य को समाज में उच्चतम सदाचार के पाठ को समझाते है। यहाँ पर देवो भवः का अर्थ है- देवता के समान मानना, उनके समान व्यवहार करना। गुरुवशानुवर्ती शिष्यः – अर्थात् शिष्य गुरु की इच्छा का अनुपाल करने वाला हो। भारतीय संस्कृति तथा परम्परा में गुरु का बहुत महत्व है। श्रध्दावांल्लभते ज्ञान – ज्ञान प्राप्ती के लिए श्रध्दा का गुण शिष्य के पास होना आवश्यक है। जब तक शिक्षक के प्रति श्रध्दा भाव नहीं होगा छात्र को ज्ञान प्राप्त नहीं होगा।  

जिस शिक्षक ने लोक-व्यवहार और धर्माचरण को अपने जीवन में उतार लिया, वही व्यक्ति मोह और भय से मुक्त होकर सही मार्गदर्शन दे सकता है। श्रेष्ठ जीवन के ये श्रेष्ठ सिद्धान्त ही समाज में उपासना के योग्य हैं। जब अध्यापक की सम्पूर्ण समाज में सर्वाधिक मान-प्रतिष्ठा हुआ करती थी, तब यह उदात्त शब्दावली शोभा देती थी, “आचार्य देवो भव।”  

 

आचार्य (शिक्षक) के उत्कर्ष के छः मुख्य गुण –

1. बुध्दि प्रामाण्य

2. दुर्दम्य जीवनाभिलाषा

3. प्रवृत्तिवाद

4. सहकार्य

5. क्षमता

6. ईश्वर निष्ठा

आचार्य (शिक्षक) के अपकर्ष के पाचँ कारण –

1. बुध्दिप्रामाण्य का अभाव

2. मुमूर्ष जीवनवृत्ति

3. अकर्मण्यवाद

4. असहकार

5. विषमता

 

बुध्दिप्रामाण्य के नहीं होने से असहकार और विषमता का प्रवेश स्वयमेव हो जाता है। शिक्षक को समाज रुपी तप्त अग्नि में तप कर स्वयं को समाज में स्वर्ण के रुप में निखारना होगा। तभी समाज उस स्वर्ण रुपी शिक्षक को महत्व देगा, उसका उचित स्थान प्रदान करेगा। शिक्षक को समाज में प्रतिष्ठित होने के लिए स्वयं को बाह्य एवं आतंरिक व्दंव्दो से संघर्ष करना पड़ेगा। समाज में स्वयं को उदाहरण के रुप में प्रस्तुत कर दूसरों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बनना होगा।

 

अनुशासन की सीख, चरित्र, नैतिकता जैसे मूल्यों की प्राण प्रतिष्ठा कर एक अनुशासित नागरिक का निर्माण भी शैक्षणिक दायित्वों में शुमार होता है। इतिहास साक्षी है कि जिस राज्य के गुरुकुल श्रेष्ठ शिक्षकों से सुसज्जित रहे उनकी यश-कीर्ति आज भी गाई जाती है। शिक्षक भूमिका कितनी अहम थी, है और रहेगी। यह श्रेष्ठ  सभ्यताओं से समझा जा सकता है। अत: आज भी शिक्षकों का व्यक्तित्व इतना आकर्षक और मुखरित होना चाहिए कि उसे सम्पूर्ण समाज पहचाने। एक शिक्षक अपनी विद्वता से ही समाज में पहचान बनाता है।

 

अब शिक्षण का कार्य दायित्व न रह कर व्यवसाय बन चुका है और व्यवसाय संवेदना से परे होता है। इसलिए संवेदनहीन हो चुकी शिक्षा व्यवस्था से कैसे आपेक्षा की जा सकती है कि वह राष्ट्र के लिए नैतिक और निष्ठा से लबरेज युवाओं की फौज खड़ी कर सकेंगे।

 

शिक्षा की महत्ता और उपयोगिता अनादिकाल से है। विद्या से अमृत प्राप्त होने जैसे सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इसीलिए विद्यादान को किसी भी दान से श्रेष्ठ माना गया और इसको देने वाले शिक्षकों के लिए  कहा गया कि ‘आचार्य देवो भव:’ अर्थात जो तुम्हें शिक्षित करता है, उसे देवता मानकर सम्मान दो। इसके लिए जरूरी है कि अध्यापक और विद्यार्थी के बीच सौहार्द्र, हो, जो आज नहीं दिखती और यही कारण है कि आज का विद्यार्थी उपाधी तो ले लेता है, लेकिन व्यवहारिक जीवन का शिक्षण, चरित्र, ज्ञान व उत्कृष्ट व्यक्तित्व का उसमें आभाव बना रहता है। ऐसी शिक्षा जो जीवन को प्रकाशित न करे, उसे समुन्नत न बनाए वह विद्या किस काम की। शिक्षा सिर्फ पढ़ाई ही नहीं बल्कि व्यक्तित्व विकास से भी जुड़ी है। शिक्षा और संस्कारों से जीवन में आत्मविश्वास, सफलता और दृढ़ इच्छा शक्ति का विकास होता है।

 

विद्यार्थियों अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का भाव रखें। क्योंकि विद्या विनय से आती है और विनय से पात्रता… और फिर पात्र व्यक्ति ही परिवार, समाज और राष्ट्र सेवा में दक्षता से जुट सकता है।

 

– डॉ. अर्पण शास्त्री

Wednesday, 15 July 2020

कोविड 19 और हम


कोविड-19 महामारी और हम
वैश्विक महामारी जिसका नाम कोरोना वायरस है। जिसे कोविड-19 का नाम दिया गया है। यह महामारी पूरे विश्व में फैल चूकी है। कोई भी ऐसा देश नहीं है जो इसकी चपेट में ना आया हो। इस महामारी ने खास और आम सभी तरह के लोगों को अपने प्रभाव में लिया है। सौ वर्ष के बाद इस प्रकार की महामारी का सामना विश्व के लोगों को करना पड रहा है। इस संकट की घड़ी में  सभी लोग कंधे से कंधा मिलाकर महामारी का डटकर मुकाबला कर रहे है। इसमें डाँक्टर, सहायक स्टॉफ, आदि प्रथम पंक्ति के कार्यरत, सैनिक के रूप में आम लोगों की जीवन की रक्षा में दिन-रात लगे हुए है। इनके महान योगदान को समाज कभी भी भूला नहीं सकता है। समाज सदैव इनका ऋणी रहेगा।

लॉकडाउन को पूरे देश ने सहज रूप से स्वीकार कर वैश्विक महामारी से लड़ने में सरकार को, प्रशासन - शासन को अपना पूर्ण समर्थन दिया। सभी लोगों ने सरकार के दिए गए निर्देशों का पूर्णतः पालन किया तथा स्वयं को महामारी से बचाया, अपने परिवार के सदस्यों का बचाव किया साथ ही समाज-देश का भी बचाव करने में अपना अहम योगदान दिया है। दुनिया के अधिकांश हिस्सो में वायरस नियंत्रण में नहीं है। इसे लेकर स्थिति बहुत खराब हो रही है।
    
आजकल कोरोना वायरस के तेजी से फैलने के केस सामने आ रहे हैं, जो चर्चा और चिंता का विषय बना हुआ है । लगातार इस वायरस से जुड़ी नई जानकारीयां सामने आ रही हैं। कोरोना वायरस का प्रकोप पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है। चीन की सरहदों को पार कर यह वायरस दुनिया के लगभग सभी देशों के लिए संकट की वजह बना हुआ है। पूरे देश में इस बीमारी से बचाव के लिए जरूरी दिशा-निर्देशों का पालन किया जा रहा है। ताकि इस वायरस के संक्रमण को रोका जा सके और इसका जैवकीय चक्र अंतराल (बायाँलजिकल साइकल ब्रेक) किया जा सके।
Ø कोरोना वायरस क्या है ?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह वायरस सी-फूड़ से जुड़ा है और इसकी शुरूआत चाइना के हुवई प्रांत के वुहान शहर के एक सी-फूड़ बाजार से ही हुई मानी जा रही है। खास बात यह है कि ये वायरस न केवल इंसानों बल्कि पशुओं को भी अपना शिकार बना रहा है।
Ø  कोरोना वायरस का प्रसार
             कोरोना वायरस को लेकर हर रोज नई-नई अपडेट्स आ रही हैं। पहले इस वायरस के बारे में कहा गया      
             था कि यह इंफेक्टेड सी-फूड खाने से ही फैलता है। जबकि हाल ही डब्ल्यूएचओ ने इस बात की संभावना  
             जताई है कि यह वायरस बेहद परिवार के लोगों में एक से दूसरे में फैल सकता है।


Ø कोरोना वायरस के लक्षण
कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति को सबसे पहले सांस लेने में दिक्कत, गले में दर्द, जुकाम, खांसी और बुखार होता है। फिर यह बुखार निमोनिया का रूप ले सकता है और निमोनिया किडनी से जुड़ी कई तरह की दिक्कतों को बढ़ा सकता है।

Ø कोरोना वायरस का इलाज
अभी तक सीधे तौर पर कोरोना वायरस पर अटैक करनेवाली कोई वैक्सीन बाज़ार में नहीं आई है। लेकिन इसके लक्षणों के आधार पर डॉक्टर्स इसके इलाज में दूसरी जरूरी दवाइयों का उपयोग कर रहे हैं। साथ ही साथ इसकी वैक्सीन तैयार करने पर भी काम चल रहा है।

Ø कोरोना वायरस से बचाव  -

ü साफ-सफाई कोरोना वायरस से बचने का सबसे अच्छा तरीका है।
ü कहीं भी बाहर से आने या कुछ भी खाने से पहले अपने हाथ अच्छी तरह साबुन से साफ करें।
ü अपने साथ हैंड सेनिटाइजर हमेशा रखें।
ü पब्लिक ट्रांसपोर्ट का यूज करने के बाद हाथ साफ किए बिना उन्हें अपने चेहरे और मुहँ पर ना लगाएँ।
ü जब तक कोरोना वायरस समाप्त नहीं हो जाता, जितना हो सके सी-फूड से दूर रहें। 
ü बीमार लोगों की देखभाल के दौरान अपनी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें।
ü बाहर जाते वक्त मास्क जरूर पहन कर जाए।


Ø कोरोना वायरस का प्रभाव
कोरोना वायरस अगर लंबे समय तक अपना प्रभाव बनाए रखने में सफल हो जाए या घातक स्तर पर पहुँच जाए तो जान के लिए खतरा पैदा कर सकता है। वहीं आपको सर्दी-जुखाम है तो इसे सीजनल फ्लू समझने की गलती न करें। कोरोना वायरस के लक्षण को पहचाने और अपनी जाचँ करवाएँ। कोरोना वायरस से बचने के लिए जहाँ तक हो सके तो बाहर निकलते वक्त मास्क का उपयोग करें। इसके अलावा अपने हाथों को बार-बार धोएँ।

इसने हमारे जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है। चाहे वह कार्यालय हो, घर हो, व्यवसायिक स्थल हो, दुकान हो पुरानी व्यवस्था को बदल दिया है। इस तरह अचानक हुए परिवर्तन से हर व्यक्ति मुश्किल में पड गया। नए बदलाव में अपनें आपको परिस्थिति के अनुरूप ढ़ालना एक चुनौति भरा काम है। हमें न चाहतें हुए भी नई परिस्थितियों के अनुरूप ढ़ालना यही समय की मांग है। इसके लिए स्वयं को तथा परिवार को सावधानी रखना महत्वपूर्ण है। हमें सावधानी रखने के लिए किन-किन बातो का ध्यान रखना चाहिए, इसके लिए डाँक्टर एवं शासन-प्रशासन के द्वारा समय- समय पर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए।

ü  अपने अच्छे भावनात्मक स्वास्थय के लिए घर में सकारात्मक उर्जा बनाएँ रखना।
ü  आंतरिक शक्ति को परिवार, समाज एवं संस्थान के लिए उपयोगी बनाना।
ü  कोरोना के संकट काल में मनुष्य को परिवार के महत्व को समझाया है, अतः परिवार की अहमियत को समझना।
ü  जीवनशैली में भी सकारत्मक परिवर्तन करना।


- अर्पण शास्त्री